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Kumar Vishwas
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Contemporary (Late 20th century – Present)  ·  प्रोफ़ाइल देखें →

कोई दीवाना कहता है

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा

यह कविता प्रेम की अत्यंत गहन, पवित्र और अव्यक्त अनुभूतियों को दर्शाती है, जहाँ प्रेमी की विरह-वेदना और समाज की संकीर्णता के बीच के द्वंद्व को चित्रित किया गया है। कवि स्पष्ट करता है कि प्रेम कोई तमाशा नहीं बल्कि आत्मा का मौन संवाद है, जिसे केवल महसूस करने वाला ही समझ सकता है। जब काल्पनिक प्रेम कहानियों को वास्तविक जीवन में जीने का प्रयास किया जाता है, तो समाज उसे स्वीकार नहीं कर पाता और हंगामा खड़ा कर देता है।
This poem depicts the profound, sacred, and unspoken emotions of love, highlighting the conflict between a lover's silent pain of separation and society's narrow-mindedness. The poet emphasizes that love is not a spectacle but a silent dialogue of souls, understood only by those who truly feel it. When one attempts to transform fictional tales of love into living reality, society struggles to accept it, leading to chaos and uproar.
Kumar Vishwas
रचनाकार
Kumar Vishwas
Contemporary (Late 20th century – Present)
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