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Manjar Bhopali
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तमाम उम्र लड़ाई लड़ो उसूलों की

तमाम उम्र लड़ाई लड़ो उसूलों की, जो जी सको तो जियो ज़िंदगी उसूलों की। ये उनके पाँव के छालों से प्यार करते हैं, कहाँ से लाओगे तुम क़िस्मतें रसूलों की। मैं उम्र भर तो घसीटा गया हूँ काँटों पर, अब मेरे मज़ार पे चादर चढ़ाओ फूलों की। बना रहे हो हर शहर को तुम मक़्तल, और दुहाई देते हो शान-ए-अमन के उसूलों की। तुम्हारे जिस्म की ख़ुशबू है कायनात-नुमा, तुम्हारे सामने औक़ात क्या है फूलों की। हवा के दम पे जो इतरा रहे हैं सहरा में, कोई बिसात नहीं वरना इन बगूलों की। वफ़ाएँ कर के भी हम बेवफ़ा ही ठहरे हैं, ये सज़ाएँ हैं बुज़ुर्गों तुम्हारी भूलों की।

यह ग़ज़ल जीवन में सिद्धांतों और उसूलों की लड़ाई लड़ने की प्रेरणा देती है, साथ ही समाज के पाखंड और विरोधाभासों पर तीखा प्रहार करती है। कवि जीवनभर संघर्ष और उपेक्षा झेलने के बाद मृत्यु पर मिलने वाले झूठे सम्मान तथा शांति का ढोंग करने वालों की हिंसात्मक प्रवृत्ति को उजागर करता है।
This ghazal inspires one to fight for principles throughout life while sharply critiquing societal hypocrisy and contradictions. The poet highlights the irony of receiving posthumous respect after a lifetime of suffering, and exposes those who preach peace while causing destruction.
Manjar Bhopali
रचनाकार
Manjar Bhopali
1970-Present
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