तमाम उम्र लड़ाई लड़ो उसूलों की
By Manjar Bhopali
तमाम उम्र लड़ाई लड़ो उसूलों की, जो जी सको तो जियो ज़िंदगी उसूलों की। ये उनके पाँव के छालों से प्यार करते हैं, कहाँ से लाओगे तुम क़िस्मतें रसूलों की। मैं उम्र भर तो घसीटा गया हूँ काँटों पर, अब मेरे मज़ार पे चादर चढ़ाओ फूलों की। बना रहे हो हर शहर को तुम मक़्तल, और दुहाई देते हो शान-ए-अमन के उसूलों की। तुम्हारे जिस्म की ख़ुशबू है कायनात-नुमा, तुम्हारे सामने औक़ात क्या है फूलों की। हवा के दम पे जो इतरा रहे हैं सहरा में, कोई बिसात नहीं वरना इन बगूलों की। वफ़ाएँ कर के भी हम बेवफ़ा ही ठहरे हैं, ये सज़ाएँ हैं बुज़ुर्गों तुम्हारी भूलों की।