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Manjar Bhopali
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ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारी है

ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के साए में ज़िंदगी गुज़ारी है धूप भी हमारी है छाँव भी हमारी है। ग़म-गुसार चेहरों पर एतबार मत करना शहर में सियासत के दोस्त भी शिकारी है। मोड़ लेने वाली है ज़िंदगी कोई शायद अब के फिर हवाओं में एक बे-क़रारी है। हाल ख़ूँ में डूबा है कल न जाने क्या होगा अब ये ख़ौफ़-ए-मुस्तक़बिल ज़ेहन ज़ेहन तारी है। मेरे ही बुज़ुर्गों ने सर-बुलंदियाँ बख़्शीं मेरे ही क़िबले पर मश्क़-ए-संग-बारी है। इक अजीब ठंडक है इस के नर्म लहजे में लफ़्ज़ लफ़्ज़ शबनम है बात बात प्यारी है। कुछ तो पाएँगे उस की क़ुर्बतों का ख़म्याज़ा दिल तो हो चुके टुकड़े अब सरों की बारी है। बाप बोझ ढोता था क्या जहेज़ दे पाता इस लिए वो शहज़ादी आज तक कुँवारी है। कह दो ‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ से हम भी शेर कहते हैं वो सदी तुम्हारी थी ये सदी हमारी है। कर्बला नहीं लेकिन झूट और सदाक़त में कल भी जंग जारी थी अब भी जंग जारी है। गाँव में मोहब्बत की रस्म है अभी ‘मंज़र शहर में हमारे तो जो भी है मदारी है।।

यह ग़ज़ल जीवन के विरोधाभासों, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संघर्षों का एक गहरा दस्तावेज़ है। कवि प्रेम की छांव और संघर्षों की धूप दोनों को सहजता से स्वीकार करता है, साथ ही राजनीतिक धोखेबाज़ी, दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों और सत्य व असत्य के शाश्वत युद्ध को रेखांकित करता है। अंततः, यह रचना विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय गरिमा, साहित्यिक स्वाभिमान और आशा को बनाए रखने का संदेश देती है।
This ghazal is a profound chronicle of life's contradictions, societal anomalies, and human struggles. The poet gracefully accepts both the shade of love and the scorching sun of hardships, while highlighting political deceit, social evils like dowry, and the eternal battle between truth and falsehood. Ultimately, it conveys a powerful message of maintaining human dignity, literary pride, and hope amidst adversity.
Manjar Bhopali
रचनाकार
Manjar Bhopali
1970-Present
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