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Manjar Bhopali
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मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए

मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए गाँव गाँव ज़ख़्मी फिजाएँ हो गई ज़हरीली घर की हवाएँ हो गई महँगी शराब से दवाएँ हो गई जाइए आवाम को जवाब दीजिए लोग जो ग़रीब थे हक़ीर हो गए आप तो ग़रीब से अमीर हो गए यानि हुज़ूर बेज़मीर हो गए ख़ुद को बेज़मीरी का ख़िताब दीजिए राहतों के नाम पे कमाई कीजिये जेब है आवाम की सफाई कीजिए लूट के गरीबो की भलाई कीजिए कुछ तो निगाहों को हिजाब दीजिए कैसी कैसी देखो योजनायें खा गए बेच कर ये अपनी आत्माएँ खा गए मार के मरीज़ों की दवाएँ खा गए इन्हें पद्मश्री का ख़िताब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए

यह कविता राजनीतिक भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता और शासक वर्ग की संवेदनहीनता पर तीखा प्रहार करती है। कवि नेताओं और सत्ताधीशों से उनके बैंक खातों का हिसाब मांगते हुए देश की बदहाली के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराता है। यह आम जनता के शोषण और गरीबों के हक को मारकर खुद को अमीर बनाने वाले भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ एक सशक्त जन-आवाज है।
This poem is a sharp critique of political corruption, social inequality, and the apathy of the ruling class. The poet demands accountability for the nation's ruin by asking leaders to show their bank passbooks, highlighting how they enrich themselves by exploiting the poor. It serves as a powerful voice against a corrupt system that deprives the common people of basic necessities while rewarding the dishonest.
Manjar Bhopali
रचनाकार
Manjar Bhopali
1970-Present
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