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दो मुक्तक

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है बेख़बर वो अपने खुदा से मगरजी रहे है  दूसरों के  हाथ देखकरपंडित ओलिया पादरी सब एक हैवे खुश है अपना क़िरदार बेचकर करके कड़ी मेहनत दिन ओर रातपास कर गए  नोकरी के इम्तेहानबाबू आ गए दबाने गरीब का गलापैसे  के घर अपना ईमान बेचकर
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