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सियाह-ए-रात में आसां भी पेचीदा हो जाता है

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क्यों पूछते हो की क्यों तकते  हो चाँद रात भरजब मालूम है चाँद में अक्स तेरा नजर आता है यकायक से तेज हो जाती धड़कन मेरे दिल कीजब भी तेरा कदम मेरी चोखट पर पड़ जाता है तुम न आये थे तो हर चीज वैसे की वैसे ही थीजैसे बीते हुए साल का टँगा पंचाग रह जाता है सबने गाये तराने मन के भरी बहार के सीने मेंमेरा तुम्हारा मिलना मिलते मिलते रह जाता है और कब तक नींद के निशां चेहरे से मिटाओगेसियाह-ए-रात में आसां भी पेचीदा हो जाता है गुजर जाते है जिनका गुजरना मुश्किल होता हैयँहा चाँद ओर सूरज पर भी ग्रहण लग जाता है यह हवस ही है इसने यँहा सबको नचा रखा  हैइसलिए अब जीवन को हल्के में लिया जाता है जब अपना कहते हो खुद पे गरूर आ जाता हैचेहरे पे खुशी और आँखों में सरूर आ जाता है न पूछो इश्क़ का मशवरा बज्म को भरा देख केकोई इसे आगम तो कोई अंजाम बता जाता है क्यों पूछते हो की क्यों तकते  हो चाँद रात भरजब मालूम है चाँद में अक्स तेरा नजर आता है
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