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मेरी कविता आज तेरी कहानी दिखाती है

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माँ बनकर ममता के आँचल में सुलाती है अनुजा बनकर गुस्से से आँख दिखाती है धरती पे इंसानी जीवन का आधा हिस्सा है मेरी कविता आज तेरी कहानी दिखाती है समाज ने एक तरफ देवी का दर्जा दिया हवस के खातिर जिस्म का सौदा किया हमेशा तेरे आधिकारो का खण्डन किया जैसे चाहा रखा शोषित किया मार दिया बेटी रूप में तूने इस धरती पे जन्म लिया पूर्वकाल से संस्कारों को तुझपे थोप दिया पुरुष क्या स्त्रियों ने भी अपना योग दिया हया शील सतीत्व तेरे चरित्र से जोड़ दिया तेरे आने पर घर पर मातम क्यों छाया था पुरुषवाद आगे सिर झुकाना सिखाया था दादा पिता भाई के हर हुकम की तामील उनके आगे प्रतिप्रश्न करना न सिखाया था पहले मायका फिर ससुराल दो घरों में रहना हर जगह घर परिवार की सेवा करते रहना शरीर वचन मन से पति के चरणों में रहना उसके दुःख-सुख को अपना जीवन समझना वक़्त के साथ तेरे हालत बदले जरूर थे कुछ लोग तेरी खुशहाली के लिए लड़े थे रजोधर्म प्रेम व्यवहार दहेज सती घरेलु हिंसा ऐसी कुप्रथाओ खिलाफ समाज से भिड़े थे धीरे धीरे कुछ परिस्थियाँ समाज की बदलने लगी रूढवादी समाज की बुद्धि धीरे धीरे बदलने लगी शिक्षा खेल-कूद राजनीति साहूकारी हर क्षेत्र में तेरी लगन निष्ठा और मेहनत से तेरी तरक्की हुई आज के दौर में भी तू कंही कंही लाचार है दीवारों पर तेरी प्रगति के लिए लगे इश्तेहार है बेटे बेटियों में भेदभाव, भ्रूणहत्या का प्रयास निकले कैसे इन दुर्गतियों से देख रही राह है समाज में मिलते तुझे अब बराबर के अधिकार है परन्तु तूने भी किया कई बार गलत इस्तेमाल है कई बार लगता है कंही परिस्थियाँ उलट न जाये नाजायज ही किया कई बेटों का जीवन ख़राब है आओ मिलकर समाज में ऐसी सोच का प्रचार करे लिंग और संबंध देख कर न किसी से व्यवहार करे आधुनिकता और फूहड़पन के अंतर को ज्ञात करे तल्ख़ न हो कोई जिंदगी ऐसे समाज का निर्माण करे
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