चल हंसा वा देस
By Sant Kabir Das
चल हंसा वा देस, जहाँ पिया बसत हैं भूल गयो है अपनो देस, जहाँ पिया बसत हैं तोर बिना मोरा जी घबरावत, अंखियन जल भर आवत है बिरह की आग लगी घट भीतर, पल-पल मोहे सतावत है काहे को तुम भूल गयो है, माटी में मिल जाई है ये पिंजरा खाली रह जाई, पंछी उड़-उड़ जाई है कहत कबीर सुनो भाई साधो, अमर लोक की बाणी है साहिब मिलन को रस्ता अगम है, गुरु बिन मुक्ति न जानी है