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Sant Kabir Das
Sant Kabir Das
15th Century (Late Medieval India / Bhakti Movement era)  ·  प्रोफ़ाइल देखें →

चल हंसा वा देस

चल हंसा वा देस, जहाँ पिया बसत हैं भूल गयो है अपनो देस, जहाँ पिया बसत हैं तोर बिना मोरा जी घबरावत, अंखियन जल भर आवत है बिरह की आग लगी घट भीतर, पल-पल मोहे सतावत है काहे को तुम भूल गयो है, माटी में मिल जाई है ये पिंजरा खाली रह जाई, पंछी उड़-उड़ जाई है कहत कबीर सुनो भाई साधो, अमर लोक की बाणी है साहिब मिलन को रस्ता अगम है, गुरु बिन मुक्ति न जानी है

यह कविता कबीरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें वे जीवात्मा (हंस) को सांसारिक मोह-माया छोड़कर अपने वास्तविक घर (परमात्मा के देश) लौटने का संदेश देते हैं। वे शरीर की नश्वरता और विरह की वेदना को दर्शाते हुए बताते हैं कि इस कठिन आध्यात्मिक मार्ग पर केवल सद्गुरु के मार्गदर्शन से ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
This poem by Kabir urges the human soul (symbolized as a swan) to transcend worldly illusions and return to its true spiritual home where the Divine resides. Highlighting the transience of the physical body and the intense pain of separation, it emphasizes that liberation from this mortal cycle is impossible without the guidance of a true spiritual master (Guru).
Sant Kabir Das
रचनाकार
Sant Kabir Das
15th Century (Late Medieval India / Bhakti Movement era)
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