पहाड़ ने मुझे साँसों की कीमत सिखाई,
शहर ने हर साँस को मक़सद दिया।
वहाँ नदियाँ रास्ता बनाते हुए बहती हैं,
यहाँ लोग रास्ते बनाते हुए बढ़ते हैं।
पहाड़ की ख़ामोशी मन को सुनना सिखाती है,
शहर का शोर ख़्वाबों के पीछे भागना।
एक की गोद में सुकून पलता है,
दूसरे की बाहों में हौसले बड़े होते हैं।
मैं किसे बेहतर कहूँ?
अगर पहाड़ मेरी जड़ें हैं,
तो शहर मेरे पर हैं।
उड़ना भी ज़रूरी है, और लौटना भी।
नींद से कहो कि आकर सुलह कर ले हमसे,
रात भर यूँ यादों का जागना अच्छा नहीं लगता।
किताब-ए-दिल के पन्ने जो पलटता हूँ अकेले में,
यूँ अश्कों से लफ़्ज़ों का भीगना अच्छा नहीं लगता।
तन्हाई के साये जब लिपट जाते हैं रूह से,
बगैर तेरे इस रात का कटना अच्छा नहीं लगता।
बहुत कोशिश की हमने भुलाने की वो गुज़रा कल,
मगर यादों की आग में यूँ जल अच्छा नहीं लगता।