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Ramdhari Singh 'Dinkar'
Ramdhari Singh 'Dinkar'
Modern Era (Adhunik Kaal) / Chhayavad and Pragativad (Progressivism)  ·  प्रोफ़ाइल देखें →

हिमालय

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार दिव्य गौरव विराट, पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त, युग-युग गर्वोन्नत नित महान, निस्सीम व्योम में सुवितान, युग-युग से किस गरिमा में व्यक्त? कैसा अखंड यह चिर-समाधि? यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान? तू महाशून्य में खोज रहा, किस जटिल समस्या का निदान? उलझन का कैसा विषम जाल? मेरे नगपति! मेरे विशाल! ओ मौन तपस्वी! खोल आँख, उपट के देख पद-तल रेणु, जल रहा स्वर्ण-युग का कपाल, साये में तेरे पावन के, हम कहाँ खो गये हैं कराल? तू थके हुए! मत सो अभी, जागृत हो, उठ रे अभय भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल!

इस कविता में राष्ट्रकवि दिनकर ने हिमालय को भारत के गौरव, पौरुष और अखंडता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है। वे हिमालय को एक मौन तपस्वी मानकर उससे अपनी समाधि तोड़ने और देश की वर्तमान दुर्दशा को सुधारने के लिए जागृत होने का आह्वान करते हैं। यह कविता राष्ट्रीय चेतना और स्वाभिमान को जगाने का एक सशक्त प्रयास है।
In this poem, national poet Dinkar portrays the Himalayas as the ultimate symbol of India's pride, valor, and integrity. Addressing the mountain as a silent ascetic, he urges it to break its eternal meditation and awaken to rescue the nation from its current plight. The poem is a powerful call to revive national consciousness and self-respect.
Ramdhari Singh 'Dinkar'
रचनाकार
Ramdhari Singh 'Dinkar'
Modern Era (Adhunik Kaal) / Chhayavad and Pragativad (Progressivism)
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