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Anjum Rehbar
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Contemporary (Late 20th century – Present)  ·  प्रोफ़ाइल देखें →

वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था मैं उसको देखने को तरसती ही रह गई जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में मैं जिसको चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

यह ग़ज़ल प्रेम की त्रासदी, सामाजिक विषमताओं और नियति की क्रूरता को गहराई से बयां करती है। इसमें कवयित्री ने अमीर-गरीब की खाई के कारण अधूरे रह गए प्रेम, समाज की संवेदनहीनता और भाग्य के क्रूर खेल को बेहद मार्मिक प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
This ghazal profoundly depicts the tragedy of love, societal disparities, and the cruelty of destiny. Through poignant metaphors, the poet expresses the pain of unfulfilled love due to the wealth gap, the apathy of society, and the harsh irony of fate where proximity turns into absolute distance.
Anjum Rehbar
रचनाकार
Anjum Rehbar
Contemporary (Late 20th century – Present)
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