← Back to Anjum Rehbar
Anjum Rehbar
Anjum Rehbar
Contemporary (Late 20th century – Present)  ·  प्रोफ़ाइल देखें →

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं। वो बेवफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं। समझाया बारहा कि बचो प्यार-व्यार से लेकिन कोई सहेली कहा मानती नहीं। मैंने तुझे मुआफ़ किया जा कहीं भी जा मैं बुज़दिलों पे अपनी कमान तानती नहीं। अंजुम’ पे हँस रहा है तो हँसता रहे जहाँ मैं बेवक़ूफ़ियों का बुरा मानती नहीं।।

यह कविता जीवन की उदासीनता, विश्वासघात और आत्म-सम्मान के गहरे भावों को व्यक्त करती है। कवयित्री अपनी परिस्थितियों और टूटे हुए रिश्तों के प्रति एक स्वाभिमानी और उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाती है, जहाँ वे कायरों को क्षमा कर देती हैं और दुनिया की मूर्खताओं पर मुस्कुराना सीख लेती हैं।
This poem profoundly expresses the themes of life's indifference, betrayal, and self-respect. The poet adopts a dignified and detached attitude towards her circumstances and broken relationships, forgiving cowards while learning to rise above the world's foolishness with grace.
Anjum Rehbar
रचनाकार
Anjum Rehbar
Contemporary (Late 20th century – Present)
सभी रचनाएँ →
← तेरा वादा ना पूरा हुआ
More Poetry

Read Gourav's Original Works