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Anjum Rehbar
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छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की,

छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की, हँसना-रोना, जागना-सोना, खोना-पाना, सुख-दुख। छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की।2 छोटी-छोटी सी बातों से मोटी-मोटी ख़बरों तक, यह गाड़ी ले जाएगी हमको माँ की गोद से कब्रों तक, चिल्लाते रह जाएंगे रुक-रुक... छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की।2 सामान की रक्षा करो लेकिन चोरों से होशियार रहो, जाने कब चलना पड़ जाए, चलने को तैयार रहो, जाने कब सीटी बज जाए सिग्नल जाये झुक छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की।2 पाप और पुण्य की गठरी बांधे सत्यनगर को जाना है, जीवन नगरी छोड़ के हमको दूर सफर को जाना है, ये भी सोचना हमने क्या-क्या माल किया है बुक... छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की।2 रात और दिन उस रेल के डिब्बे और सांसों का इंजन है, उम्र है इस गाड़ी के पहिए और चिता हिल स्टेशन है, जैसे दो पटरी हों वैसे साथ चलेंगे सुख-दुख... छुक छुक छुक छुक रेल चली है जीवन की।2

यह कविता जीवन को एक रेल यात्रा के रूप में चित्रित करती है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक निरंतर चलती रहती है। इसमें सुख-दुख, पाप-पुण्य और समय के पहियों के माध्यम से मानव अस्तित्व की नश्वरता और कर्मों के महत्व को दर्शाया गया है। कवि संदेश देता है कि हमें अपने अच्छे कर्मों की पूंजी संभालकर रखनी चाहिए, क्योंकि यह जीवन यात्रा कभी भी समाप्त हो सकती है।
This poem portrays life as a train journey that continuously moves from birth to death. Through the metaphors of joy-sorrow, sin-virtue, and the wheels of time, it reflects on the transience of human existence and the importance of one's deeds. The poet conveys that we must safeguard our good deeds, as this journey of life can end at any moment.
Anjum Rehbar
रचनाकार
Anjum Rehbar
Contemporary (Late 20th century – Present)
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