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Akbar Allahabadi
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हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है

हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है ऐ शौक़ वही मय पी ऐ होश ज़रा सो जा मेहमान-ए-नज़र इस दम इक बर्क़-ए-तजल्ली है वाँ दिल में कि सदमे दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है ता'लीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है सच कहते हैं शैख़ अकबर है ताअत-ए-हक़ लाज़िम हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है

इस ग़ज़ल में अकबर इलाहाबादी ने मदिरा (मय) को एक प्रतीक मानकर समाज के पाखंड, धार्मिक कट्टरता और नैतिकता के दोहरे मानदंडों पर गहरा कटाक्ष किया है। वे कहते हैं कि आंतरिक सत्य और आध्यात्मिक आनंद को समझे बिना बाहरी दिखावा करने वाले लोग व्यर्थ का हंगामा खड़ा करते हैं, जबकि वास्तविक भक्ति और प्रेम हृदय के भीतर निवास करता है।
In this ghazal, Akbar Allahabadi uses the metaphor of wine to critique societal hypocrisy, religious orthodoxy, and double standards of morality. He suggests that those who lack inner spiritual experience create unnecessary uproar over superficial matters, whereas true devotion and divine love reside deep within the heart.
आह जो दिल से निकाली जाएगी →
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