Akbar Allahabadi
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आह जो दिल से निकाली जाएगी
आह जो दिल से निकाली जाएगी क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी इस नज़ाकत पर ये शमशीर-ए-जफ़ा आप से क्यूँकर सँभाली जाएगी क्या ग़म-ए-दुनिया का डर मुझ रिंद को और इक बोतल चढ़ा ली जाएगी शैख़ की दावत में मय का काम क्या एहतियातन कुछ मँगा ली जाएगी याद-ए-अबरू में है 'अकबर' महव यूँ कब तिरी ये कज-ख़याली जाएगी
हिंदी भावार्थ
अकबर इलाहाबादी की यह ग़ज़ल मानवीय भावनाओं, प्रेम की पीड़ा और सामाजिक पाखंड पर गहरा कटाक्ष करती है। कवि का मानना है कि दिल से निकली हुई आह कभी निष्फल नहीं होती और वह ईश्वर तक अवश्य पहुँचती है। इसके साथ ही, वे दुनिया के दुखों से बेपरवाह होकर अपनी मस्ती में जीने और समाज के दोहरे रवैये पर व्यंग्य करते हैं।
English Translation
This ghazal by Akbar Allahabadi profoundly reflects on human emotions, the pain of love, and social hypocrisy. The poet asserts that a sigh arising from the depths of the heart never goes in vain and is bound to be heard. Alongside, he satirizes the world's sorrows with a carefree attitude and mocks the dual standards of society.