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Manjar Bhopali
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इस को पहली बार ख़त लिक्खा तो दिल धड़का बहुत

इस को पहली बार ख़त लिक्खा तो दिल धड़का बहुत क्या जवाब आएगा कैसे आएगा डर था बहुत जान दे देंगे अगर दुनिया ने रोका रास्ता और कोई हल न निकला हम ने तो सोचा बहुत अब समझ लेते हैं मीठे लफ़्ज़ की कड़वाहटें हो गया है ज़िंदगी का तजरबा थोड़ा बहुत सोच लो पहले हमारे हाथ में फिर हाथ दो इश्क़ वालों के लिए हैं आग के दरिया बहुत वो थी आँगन में पड़ोसी के मैं घर की छत पे था दूरियों ने आज भी दोनों को तड़पाया बहुत इस से पहले तो कभी एहसास होता ही न था तुझ से मिल कर सोचते हैं रो लिए तन्हा बहुत आँख होती तो नज़र आ जाते छाले पाँव के सच को क्या देखेगा अपना शहर है अंधा बहुत।

यह ग़ज़ल प्रेम के शुरुआती संकोच, उसकी राह में आने वाली सामाजिक बाधाओं और जीवन के कड़वे अनुभवों से मिलने वाली परिपक्वता को दर्शाती है। कवि प्रेम की अग्नि-परीक्षा और समाज की संवेदनहीनता को रेखांकित करते हुए कहता है कि सच्चा प्रेम जहाँ असीम दर्द देता है, वहीं वह इंसान को दुनिया की असलियत समझने का नज़रिया भी प्रदान करता है।
This ghazal depicts the initial hesitation of love, the societal obstacles in its path, and the maturity gained from life's bitter experiences. Highlighting the trial by fire of love and the apathy of society, the poet suggests that while true love inflicts immense pain, it also grants a perspective to understand the harsh realities of the world.
Manjar Bhopali
रचनाकार
Manjar Bhopali
1970-Present
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