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Jaun Elia
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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या

उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नुक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या

जौन एलिया की यह कालजयी रचना जीवन की अनवरत परीक्षाओं, एकाकीपन और अस्तित्वगत संकट को दर्शाती है। कवि समाज की उदासीनता, अपनों की चुप्पी और प्रेम में मिली गहरी निराशा पर तीखे सवाल उठाता है। यह कविता मानवीय हृदय की उस तड़प को बयां करती है जहाँ किसी एक शख्स के चले जाने से पूरी कायनात बेमानी और सूनी लगने लगती है।
This timeless creation by Jaun Elia depicts life's relentless trials, loneliness, and existential crisis. The poet raises sharp questions about the apathy of society, the silence of loved ones, and the deep despair experienced in love. The poem beautifully expresses the agony of the human heart where the loss of a single person makes the entire universe feel meaningless and empty.
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