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साहिल पे खड़े, मुझे क्या गम, चले जाना है,

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साहिल पे, खड़े मुझे क्या गम, चले जाना है, मैं साँस की आख़िरी किश्ती हूँ, अब डूब जाना है। याद है, पहली मुलाक़ात, वो झिझक, वो मुस्काना, दो अजनबियों का धीरे-धीरे एक जहाँ बन जाना। हाथ थाम कर उम्र बिताने की जो क़सम उठाई थी, राह अब छूट रही है, बस इतना अफ़साना है। साहिल पे, खड़े मुझे क्या गम, चले जाना है, मैं साँस की आख़िरी, किश्ती हूँ, अब डूब जाना है। घर की पहली, चौखट पहला, सपना पहली बरसात, रूठना मनाना, तेरा-मेरा, छोटी-छोटी हर बात। सुबह की चाय, तेरी हँसी, रातों की वो बात, इन्हीं, यादों को सीने में लेकर, अब जाना है। साहिल पे खड़े, मुझे क्या गम, चले जाना है, मैं साँस की आख़िरी, किश्ती हूँ, अब डूब जाना है। मुझे मौत का डर नहीं, बस एक फ़िक्र सताती है, मेरे बाद तू अपनी ख़ामोशी किससे बताती होगी। मेरे हिस्से की हँसी भी तेरी अब आँसू बन जाएगी, यही सोचकर मेरी हर साँस थोड़ी-थोड़ी मर जाती है। साहिल पे खड़े, मुझे क्या गम, चले जाना है, मैं साँस की आख़िरी, किश्ती हूँ, अब डूब जाना है। कल मेरी तस्वीर से शायद तू बातें भी करेगा, मेरी हँसी को याद कर चुपके से रो भी लेगा। वक़्त तुझे जीना सिखा देगा, ये मैं भी जानता हूँ, पर मेरा नाम सुनते ही दिल तेरा भर आना है। साहिल पे खड़े, मुझे क्या गम, चले जाना है, मैं साँस की आख़िरी, किश्ती हूँ, अब डूब जाना है।

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