Gulzar
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शाम से आँख में नमी सी है
शाम से आँख में नमी सी है आज फिर आप की कमी सी है दफ़्न कर दो हमें के साँस मिले नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर इस की आदत भी आदमी सी है कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी एक तस्लीम लाज़मी सी है कौन पथरा गया है आँखों में बर्फ़ पलकों पे क्यों जमी सी है आइये रास्ते अलग कर लें ये ज़रूरत भी बाहमी सी है
हिंदी भावार्थ
यह प्रसिद्ध ग़ज़ल मानवीय संवेदनाओं, विरह की गहरी वेदना और रिश्तों के बिखराव को बयां करती है। कवि अपनी तन्हाई और प्रियतम की कमी को आँखों की नमी के माध्यम से व्यक्त करता है, जहाँ समय की चंचलता और आपसी सहमति से अलग होने की मजबूरी को बेहद खूबसूरती से दर्शाया गया है। यह रचना जीवन के अधूरेपन और उसमें छिपे मौन दर्द का एक जीवंत दस्तावेज़ है।
English Translation
This famous ghazal beautifully portrays human emotions, the deep pain of separation, and the unraveling of relationships. The poet expresses his loneliness and the yearning for his beloved through the dampness in his eyes, masterfully depicting the fleeting nature of time and the mutual necessity of parting ways. The piece stands as a poignant testament to life's incompleteness and the silent grief within it.