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Mir Muhammad Taqi
Mir Muhammad Taqi
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नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए

हस्ती अपनी हबाब की सी है ये नुमाइश सराब की सी है नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए पंखुड़ी इक गुलाब की सी है चश्म-ए-दिल खोल इस भी आलम पर याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है बार बार उस के दर पे जाता हूँ हालत अब इज़्तिराब की सी है नुक़्ता-ए-ख़ाल से तिरा अबरू बैत इक इंतिख़ाब की सी है मैं जो बोला कहा कि ये आवाज़ उसी ख़ाना-ख़राब की सी है आतिश-ए-ग़म में दिल भुना शायद देर से बू कबाब की सी है देखिए अब्र की तरह अब के मेरी चश्म-ए-पुर-आब की सी है 'मीर' उन नीम-बाज़ आँखों में सारी मस्ती शराब की सी है

मीर तकी मीर की यह कालजयी ग़ज़ल मानव जीवन की नश्वरता और प्रेम की गहन पीड़ा को दर्शाती है। कवि इस संसार को एक बुलबुले और मृगतृष्णा की तरह क्षणभंगुर मानते हैं, जहाँ प्रियतम के होठों की कोमलता गुलाब की पंखुड़ी जैसी है और उनकी अर्ध-खुली आँखें मदिरा सा नशा बिखेरती हैं। यह रचना जीवन के भ्रम और प्रेम की व्याकुलता का एक अत्यंत सुंदर और दार्शनिक चित्रण है।
This timeless ghazal by Mir Taqi Mir depicts the transience of human existence and the profound agony of love. The poet views the world as fleeting, akin to a bubble or a mirage, while describing the beloved's lips as delicate as a rose petal and their half-closed eyes as intoxicating as wine. The work is an exquisitely beautiful and philosophical portrayal of life's illusion and the restlessness of love.
Mir Muhammad Taqi
रचनाकार
Mir Muhammad Taqi
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