Ghazal
adbhuta
हर इक नज़ारे में देखो ख़ुदा का साया है
हर इक नज़ारे में देखो ख़ुदा का साया है
बहार-ए-ज़िंदगी देखो तो क्या रंग लाया है
गुलों की शाख़ पे पत्तों का आज मेला है
महकती कलियों से मौसम नया क्या रंग लाया है
हवा में झूमते पेड़ों की वो हँसी सुन लो
कहीं चहकते परिंदों का ये क्या रंग लाया है
कोई पुकार रहा दूर से अब हमें 'उस्ताद'
नज़र की प्यास में दिल का मेरे क्या रंग लाया है
अभी तो धूप थी आँगन में और शाम ढलने को
ये आसमाँ पे बदलते हुए क्या रंग लाया है
निगाह-ए-यार में वो एक अदा जो देखी थी
उसी के बाद से हर शय पे क्या रंग लाया है
घरों में आज है होली का ये अनोखा समाँ
गुलाल-ए-इश्क़ हर इक दिल पे क्या रंग लाया है
नया है दौर ये ज़ाहिर में और बातिन में
हर इक तरफ़ है तमाशा नया, क्या रंग लाया है