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वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था

Anjum Rehbar — poet profile photo Anjum Rehbar · Hindi
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था by Anjum Rehbar — cover image
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Editorial Context

A heartbreaking hindi poem by Anjum Rehbar about the painful irony of growing apart from someone who once felt like the closest person in the world.

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था मैं उसको देखने को तरसती ही रह गई जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में मैं जिसको चाहती थी वो लड़का ग़रीब था