Devotion

प्रेमी

Sant Kabir Das — poet profile photo Sant Kabir Das · Hindi
प्रेमी by Sant Kabir Das — cover image
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Editorial Context

Kabir Das's "Premi" is a profound doha about the rarity of true love — both human and divine. A short but deeply meaningful verse from one of India's greatest saint-poets.

प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै न कोइ प्रेमी कूँ प्रेमी मिलै तब, सब विष अमृत होइ

Explanation

कबीर कहते हैं कि मैं इस दुनिया में सच्चे प्रेमी की तलाश में भटक रहा हूँ, लेकिन कोई मिलता ही नहीं। यहाँ “प्रेमी” का मतलब सिर्फ romantic lover नहीं है। यह उस इंसान की बात है जो: स्वार्थ से ऊपर उठ चुका हो, सच्चे दिल से प्रेम करता हो, अहंकार (ego) छोड़ चुका हो कबीर का इशारा है कि सच्चा प्रेम बहुत दुर्लभ है, लोग ज़्यादातर दिखावा करते हैं, असली समर्पण नहीं। अब मान लो कि अगर दो ऐसे सच्चे प्रेमी मिल जाएँ… तो क्या होगा? “विष” यानी ज़हर भी “अमृत” बन जाएगा। मतलब: दुख → सुख में बदल जाएगा, संघर्ष → सहज हो जाएगा, जीवन की कठिनाइयाँ → हल्की लगने लगेंगी क्योंकि जब प्रेम शुद्ध होता है, तो वो हर नकारात्मक चीज़ को बदल देता है। सच्चा प्रेम बहुत दुर्लभ है, लेकिन अगर दो सच्चे दिल मिल जाएँ, तो दुनिया की हर कड़वाहट भी मिठास में बदल सकती है।