Ghazal
shringara
एक इशारे पे उसके दिल का दरवाजा खोल सकता है
एक इशारे पे उसके दिल का दरवाजा खोल सकता है
इश्क़ में आशिक़ अपनी बात आखों से बोल सकता है
झुका लेता हूँ अपना सर हर दरगाह देख कर
इबादत में अपने राज़-ए-दिल खोल सकता है।
हैरानी क्यों है अगर ढूंढ़ता हूँ मुसाफिर बात करने को
अकेला इंसान अकेले कितना बोल सकता है।
आरजू नहीं थी कोई होगा हमसफ़र अब इस संसार में
पर मिल गया वो जो मेरी खामोशियां तौल सकता है।
रुक गयी मेरी हयात आकर एक अजब चौराहे पे
डर है इस मोड़ पर फिर मेरा यकीन डोल सकता है।
सिमट गयी शहरों की मेजबानी दहलीज के इक तरफ
बंद दरवाज़ों में कौन अपनापन टटोल सकता है।
यह चाँद टुटा हुआ एक पत्थर का टुकड़ा ही तो है
फिर कैसे ये अंधेरी रातों में चाँदनी घोल सकता है।
रवाँ हूँ मैं उसी जानिब जिधर उसके पैरों के निशां मिले
मेरे दीवानेपन का कोई कैसे मोल तोल सकता है।
सितम न कर किसी मजलूम पे ए सितमगर
सितम बेइंतहा हो तो गूंगा भी बोल सकता है।
किसी को आजमाना महंगा भी पड़ सकता है
किसी रोज वो तेरा राज़ भी खोल सकता है
सत्ता का नशा कभी रहता ही नहीं
किसी की आहों से ये सिंहासन कभी भी डोल सकता है
पलड़ा पलटते देर कहा लगती है
कभी वो भी तुझे पैरों तले रोल सकता है