ऐसा भी हो सकता था
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तुम कहते हो मिल न पाए,
बंधन तो तुमने डाले थे।
तुम खुद वो दीवारें गिराते,
ऐसा भी हो सकता था।
दुनिया की बातों में आकर,
तुमने मुझसे दूरी की।
दुनिया की तुम फिक्र न करते,
ऐसा भी हो सकता था।
अपने भरे-पूरे आंगन में,
तुम तो पहले से निहाल थे।
कुछ मेरे भी ख्वाब सजाते,
ऐसा भी हो सकता था।
तेरी खुशी में ही मेरी खुशी थी,
इसलिए मैंने लब सी लिए।
तुम बिन कहे मेरा दर्द समझते,
ऐसा भी हो सकता था।
अब जो चोरी-छिपे मिलते हैं,
एक डर सा दिल में रहता है।
बिना खौफ के बाहें फैलाते,
ऐसा भी हो सकता था।
बंद कमरे में चुपके रोते हो,
अपनी मजबूरी पे पछताते हो।
वक़्त रहते अगर कदम उठाते,
ऐसा भी हो सकता था।
महफ़िल में जब टकराते हैं,
अनजान बनके गुज़र जाते हैं।
मेरा हाथ पकड़ तुम रुक जाते,
ऐसा भी हो सकता था।
मुझसे नज़रें अब चुराते हो,
अपना दर्द छुपाते फिरते हो।
एक बार बस सीने से लग जाते,
ऐसा भी हो सकता था।
मैं चुपचाप पीछे हट गया,
अपना सारा प्यार कुर्बान किया।
तुम भी मेरी खातिर रुक जाते,
ऐसा भी हो सकता था।
मैंने दे दीं बस दुआएं तुझको,
और दिल में तुझे बसा लिया।
हम दोनों अपना जहान बसाते,
ऐसा भी हो सकता था।
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Gourav Baloria
verifiedGourav Baloria is a versatile Product Owner and Scrum Master who bridges the gap between technical execution and strategic vision. Beyond his IT career, Gourav is a passionate entrepreneur and community builder, leading purpose-driven initiatives like Himachali In Pune Community and contributing to the sustainability non-profit, The Paper Ball. Balancing his technical acumen with creative pursuits, Gourav is an avid writer and lover of Hindi, English and Himachali poetry, sharing his passion through his platform.