adbhuta
हिमालय
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
साकार दिव्य गौरव विराट,
पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम-किरीट!
मेरे भारत के दिव्य भाल!
युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त,
युग-युग गर्वोन्नत नित महान,
निस्सीम व्योम में सुवितान,
युग-युग से किस गरिमा में व्यक्त?
कैसा अखंड यह चिर-समाधि?
यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान?
तू महाशून्य में खोज रहा,
किस जटिल समस्या का निदान?
उलझन का कैसा विषम जाल?
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
ओ मौन तपस्वी! खोल आँख,
उपट के देख पद-तल रेणु,
जल रहा स्वर्ण-युग का कपाल,
साये में तेरे पावन के,
हम कहाँ खो गये हैं कराल?
तू थके हुए! मत सो अभी,
जागृत हो, उठ रे अभय भाल!
मेरे नगपति! मेरे विशाल!