Sad
शाम से आँख में नमी सी है
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About This Piece
This beautiful literary work, titled "शाम से आँख में नमी सी है" was authored by Gulzar and explores themes of sad. Please take a moment to read and reflect deeply on the verses below.
शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है
दफ़्न कर दो हमें के साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
इस की आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है
कौन पथरा गया है आँखों में
बर्फ़ पलकों पे क्यों जमी सी है
आइये रास्ते अलग कर लें
ये ज़रूरत भी बाहमी सी है