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शाम से आँख में नमी सी है

Gulzar — poet profile photo Gulzar · Hindi
शाम से आँख में नमी सी है आज फिर आप की कमी सी है दफ़्न कर दो हमें के साँस मिले नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर इस की आदत भी आदमी सी है कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी एक तस्लीम लाज़मी सी है कौन पथरा गया है आँखों में बर्फ़ पलकों पे क्यों जमी सी है आइये रास्ते अलग कर लें ये ज़रूरत भी बाहमी सी है